नई दिल्ली, 1 जुलाई: प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों को गंभीर आपराधिक मामलों में 30 दिनों तक लगातार न्यायिक हिरासत में रहने पर पद से हटाने से जुड़े प्रस्तावित कानून को लेकर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) अपनी बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट 17 जुलाई को अपनाने और संसद के समक्ष पेश करने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, समिति अपनी रिपोर्ट में इस विधेयक के सबसे चर्चित और विवादास्पद प्रावधान—30 दिन की लगातार हिरासत के बाद पद से हटाने के नियम—को बरकरार रखने की सिफारिश कर सकती है। हालांकि, इसके संभावित राजनीतिक दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी शामिल किए जाने की संभावना है।
यह पूरा मामला संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 से जुड़ा है, जिसे पिछले वर्ष संसद में पेश किया गया था। इस विधेयक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री ऐसे गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होकर लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो, तो उसे पद छोड़ना होगा। प्रस्तावित प्रावधान के अनुसार, यदि संबंधित व्यक्ति 31वें दिन तक पद नहीं छोड़ता है, तो उसे स्वतः पद से हटाने की प्रक्रिया लागू हो सकती है।
इस विधेयक की जांच के लिए गठित 31 सदस्यीय JPC, जिसकी अध्यक्षता सांसद अपराजिता सारंगी कर रही हैं, ने पिछले कई महीनों में कानूनी विशेषज्ञों, संवैधानिक विद्वानों और विभिन्न संस्थाओं से विस्तृत चर्चा की है। समिति ने इस बात पर भी विचार किया कि कानून ऐसा हो जो शासन में जवाबदेही सुनिश्चित करे, लेकिन साथ ही राजनीतिक प्रतिशोध का माध्यम न बन सके।
सूत्रों के मुताबिक, समिति की सिफारिशों में यह भी शामिल हो सकता है कि कानून का दायरा सभी मामलों पर लागू न होकर केवल गंभीर अपराधों तक सीमित रखा जाए। साथ ही, रिपोर्ट में ऐसे प्रावधान जोड़ने की संभावना है जो यह सुनिश्चित करें कि किसी निर्दोष जनप्रतिनिधि को केवल राजनीतिक कारणों से झूठे मामलों में फंसाकर पद से हटाने का रास्ता न खुले।
इस प्रस्तावित कानून को लेकर राजनीतिक मतभेद भी गहरे हैं। सत्तापक्ष का कहना है कि यदि कोई मंत्री लंबे समय तक जेल में रहता है तो सरकार के प्रभावी संचालन और जनता के विश्वास पर असर पड़ता है। उनके अनुसार, 30 दिनों की अवधि के दौरान आरोपी के पास कई बार जमानत के लिए अदालत जाने का अवसर होता है, इसलिए यह प्रावधान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है।
वहीं विपक्ष ने इस प्रस्ताव का लगातार विरोध किया है। विपक्षी दलों का तर्क है कि सिर्फ हिरासत के आधार पर, बिना किसी दोषसिद्धि (Conviction) के, किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को पद से हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों, संघीय ढांचे और प्राकृतिक न्याय की भावना के विपरीत हो सकता है। विपक्ष का यह भी आरोप है कि इस तरह के कानून का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। जानकारी के अनुसार, JPC में शामिल कुछ विपक्षी सदस्य रिपोर्ट पर असहमति नोट (Dissent Note) भी दर्ज करा सकते हैं।
यदि JPC 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देती है, तो इसके बाद इस विधेयक को संसद के आगामी मानसून सत्र में चर्चा और आगे की प्रक्रिया के लिए लाया जा सकता है। ऐसे में यह प्रस्ताव आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक बहस का केंद्र बनने की पूरी संभावना है।

