Saturday, June 13, 2026
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कड़ाके की धूप और आशियाने उजड़ने का दर्द; मालगांव में बुलडोजर कार्रवाई के बाद सुलगते सवाल

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कोंडागांव (छत्तीसगढ़)।

“सालों से हम इस जंगल में रह रहे थे, आज अचानक साहब लोग आए और हमारा सब कुछ मलबे में मिला दिया…” यह रोते हुए शब्द कोंडागांव के ग्राम पंचायत मालगांव की एक बुजुर्ग आदिवासी महिला के हैं।

कोंडागांव जिले के मालगांव वन क्षेत्र में प्रशासन द्वारा चलाई गई बड़ी बेदखली कार्रवाई के बाद का मंशा और माहौल बेहद गमगीन है। जहाँ एक तरफ प्रशासन इसे 70 एकड़ वन भूमि को अवैध कब्जे से मुक्त कराने की एक ‘सफल’ कार्रवाई मान रहा है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर बिखरा गृहस्थी का सामान और बेघर हुए परिवारों के आंसू विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

भारी पुलिस बल के साथ अचानक पहुंचे बुलडोजर

चश्मदीदों के मुताबिक, वन विभाग, राजस्व और पुलिस की संयुक्त टीम अचानक जेसीबी मशीनों के साथ मालगांव के जंगलों में पहुंची। देखते ही देखते सालों से बने कच्चे मकानों और झोपड़ियों को ढहा दिया गया। कड़कती धूप और उमस के बीच बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग अपने बर्तनों, कपड़ों और अनाज को समेटने के लिए जद्दोजहद करते नजर आए। कई परिवारों का आरोप है कि उन्हें अपना सामान ठीक से निकालने तक का मौका नहीं मिला।

सोशल मीडिया पर तीखी बहस: “यह विकास है या विनाश?

इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोगों में भारी आक्रोश है। स्थानीय नागरिकों और नेटिजन्स (Netizens) ने सरकार और प्रशासन को आड़े हाथों लिया है।

  • नक्सल मुक्ति बनाम अधिकार: सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या बस्तर के इन इलाकों को नक्सल मुक्त इसलिए कराया गया था ताकि बाद में गरीब आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से ही बेदखल कर दिया जाए?
  • वनाधिकार पट्टों का सवाल: स्थानीय स्तर पर यह मांग तेज हो रही है कि जो आदिवासी पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं, उन्हें बेदखल करने के बजाय वनाधिकार कानून (FRA) के तहत पट्टे क्यों नहीं दिए गए?

बुनियादी सवाल: अब कहाँ जाएंगे ये परिवार?

प्रशासन का कहना है कि नियमानुसार नोटिस देने के बाद ही यह कानूनी कार्रवाई की गई है और सरकारी जमीन पर किसी भी तरह का अवैध कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कानून अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से देखें तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस भीषण मौसम में खुले आसमान के नीचे आ चुके इन गरीब परिवारों का अब पुनर्वास कैसे होगा?

न्याय और नियम के इस फेर में फिलहाल मालगांव के आदिवासी परिवार अपने ही देश में बेघर होकर दाने-दाने को मोहताज दिख रहे हैं।

क्या यह टोन आपके काम के लिए सही है? यदि आप इसमें राजनीति (जैसे कांग्रेस या बीजेपी का पक्ष) या कोई अन्य एंगल जोड़ना चाहते हैं, तो मुझे बताएं।

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