विजयादशमी पर रावण दहन को लेकर मध्य प्रदेश के उज्जैन में विवाद सामने आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, रावण दहन के आयोजन को लेकर कुछ लोगों ने रामलीला समितियों को पत्र भेजकर इस पर आपत्ति जताई है। साथ ही रावण दहन के विषय पर शास्त्रार्थ कराने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इस मामले को लेकर क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ ने विरोध दर्ज कराते हुए धार्मिक परंपराओं और जातिगत श्रेष्ठता के मुद्दे पर सवाल उठाए हैं।
क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ का आरोप है कि रावण को महिमामंडित करने और विजयादशमी पर उसके दहन का विरोध करने के प्रयासों के पीछे जातिगत विचारधारा काम कर रही है। संगठन ने कहा कि धर्म और हिंदू एकता की बात करने वाले लोगों को समाज में जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने से बचना चाहिए। महासंघ ने भगवान परशुराम और रावण को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं पर भी आपत्ति जताई है।
संगठन ने अपने बयान में कहा कि धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को जाति के चश्मे से देखना उचित नहीं है। महासंघ का आरोप है कि कुछ संगठन भगवान परशुराम को विशेष महत्व देते हुए अन्य धार्मिक परंपराओं की तुलना में उन्हें प्रमुखता से प्रस्तुत करते हैं। संगठन ने इस दृष्टिकोण को जातिगत श्रेष्ठता की मानसिकता से जोड़ते हुए इसकी आलोचना की है।
महासंघ ने रावण दहन का विरोध करने के प्रयासों को लेकर भी नाराजगी जताई। संगठन का कहना है कि विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है। ऐसे में इस परंपरा को लेकर उठने वाले विवादों पर संवाद और तथ्यात्मक चर्चा होनी चाहिए, लेकिन समाज में जातिगत वैमनस्य को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।
अपने बयान में क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ ने महात्मा ज्योतिबा फुले की पुस्तक ‘गुलामगिरी’ का भी उल्लेख किया। संगठन ने लोगों से पुस्तक में वर्णित विचारों और ऐतिहासिक संदर्भों पर चिंतन करने की अपील की। साथ ही जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता से जुड़े मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने की बात कही।
फिलहाल, इस मामले में संबंधित रामलीला समितियों और पत्र भेजने वाले पक्ष की विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है। विवाद से जुड़े सभी पक्षों का पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

