लेह। लद्दाख की ठंडी और शुष्क जलवायु में पानी की कमी से निपटने के लिए प्रशासन ने ग्लेशियर के पानी को संरक्षित कर खेती और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। केंद्र शासित प्रदेश में ‘प्रोजेक्ट हिम सरोवर’ और अन्य जल प्रबंधन पहलों के जरिए ग्लेशियर से बहकर निकलने वाले पानी को सीधे सिंचाई और जलाशयों तक पहुंचाया जा रहा है। प्रशासन का लक्ष्य पानी की हर संभव बूंद का स्थानीय जरूरतों और कृषि के लिए इस्तेमाल करना है।
लद्दाख प्रशासन के मुताबिक, लेह के आसपास स्टोक ग्लेशियर से निकलने वाले पानी का एक बड़ा हिस्सा पहले बिना इस्तेमाल के सिंधु नदी की ओर चला जाता था। अब इसी पानी को Igoo-Phey सिंचाई नहर और चूशोत क्षेत्र की नहरों तक पहुंचाया जा रहा है। इस पहल के तहत करीब 9 करोड़ लीटर ग्लेशियर का पानी प्रतिदिन उपयोग में लाया जा रहा है, जिससे करीब 12 गांवों में सिंचाई को बढ़ावा देने और 1000 एकड़ से ज्यादा बंजर जमीन को खेती योग्य बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
‘प्रोजेक्ट हिम सरोवर’ से जल संरक्षण को बढ़ावा
लद्दाख में पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए अप्रैल 2026 में प्रोजेक्ट हिम सरोवर शुरू किया गया था। इस परियोजना के पहले चरण में लेह और कारगिल में 50 जलाशय बनाने की योजना रखी गई थी, ताकि बर्फ और ग्लेशियर से पिघलने वाले पानी को संरक्षित किया जा सके और कृषि के लिए नियमित जल स्रोत तैयार हो।
स्पितुक फरका क्षेत्र में इस योजना के तहत जलाशयों का निर्माण किया गया है। प्रशासन के अनुसार, यहां तैयार जलाशयों से लंबे समय से बंजर पड़ी जमीन में कृषि गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। जून में स्पितुक फरका में परियोजना के तहत पहला जलाशय चालू किया गया था, जिसकी क्षमता करीब 60 लाख लीटर बताई गई थी।
प्रशासन का मानना है कि इस तरह छोटे-छोटे जलाशयों में ग्लेशियर और बर्फ से मिलने वाले पानी को रोककर स्थानीय स्तर पर जल सुरक्षा मजबूत की जा सकती है। इससे किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होगा और पानी की कमी के कारण प्रभावित कृषि भूमि का इस्तेमाल बढ़ाया जा सकेगा।
1000 एकड़ से ज्यादा बंजर जमीन को मिलेगा पानी
स्टोक नाला से ग्लेशियर का पानी सीधे सिंचाई व्यवस्था तक पहुंचाने की पहल को लद्दाख प्रशासन ने जल प्रबंधन की महत्वपूर्ण परियोजना बताया है। प्रशासन के अनुसार, करीब 9 करोड़ लीटर पानी प्रतिदिन Igoo-Phey और Yokyur नहरों की ओर मोड़ा जा रहा है।
इस पानी से 1000 एकड़ से ज्यादा बंजर जमीन में सिंचाई की क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है। प्रशासन का कहना है कि इससे कृषि उत्पादन बढ़ने के साथ ग्रामीण इलाकों में रोजगार और किसानों की आय को भी बढ़ावा मिल सकता है।
इस पहल की खास बात यह है कि पानी को मोड़ने के लिए बड़े स्तर पर महंगे निर्माण की जगह साधारण अर्थवर्क और गुरुत्वाकर्षण आधारित व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया है। प्रशासन इसे लद्दाख जैसे संवेदनशील और कठिन भौगोलिक क्षेत्र के लिए कम लागत वाली जल प्रबंधन व्यवस्था के रूप में देख रहा है।
अब सूख रही Tso Kar झील को बचाने की तैयारी
लद्दाख में ग्लेशियर के पानी को बचाने की एक और बड़ी योजना Tso Kar झील को पुनर्जीवित करने के लिए शुरू की गई है। प्रशासन के अनुसार, रुपशो खारनाक ग्लेशियर की धारा से निकलने वाला करीब 32 करोड़ लीटर पानी प्रतिदिन अब तक बिना इस्तेमाल के सिंधु नदी की ओर चला जाता था। इस पानी को Tso Kar झील की ओर मोड़ने की योजना पर काम शुरू किया गया है।
करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित Tso Kar झील पिछले एक दशक में लगभग 70 प्रतिशत तक सिकुड़ चुकी है। प्रशासन के अनुसार, झील का क्षेत्रफल पहले करीब 11 हजार एकड़ था, जो अब लगभग 3200 एकड़ रह गया है। इसके कारण यहां आने वाले प्रवासी पक्षियों और खासकर ब्लैक-नेक्ड क्रेन के आवास पर भी असर पड़ा है।
तीन नए वेटलैंड भी तैयार होंगे
Tso Kar को पुनर्जीवित करने की परियोजना में ग्लेशियर के पानी को सीधे झील में डालने के बजाय रास्ते में मौजूद तीन प्राकृतिक गड्ढों और जल निकायों में पहले जमा करने की योजना बनाई गई है। इन जल निकायों का क्षेत्रफल करीब 270 एकड़, 24 एकड़ और 10 एकड़ बताया गया है।
प्रशासन के मुताबिक, इन तीनों स्थानों पर पानी जमा होने से नए मीठे पानी के वेटलैंड तैयार होंगे। इनमें तलछट जमा होने के बाद अपेक्षाकृत साफ पानी को आगे Tso Kar झील की ओर भेजा जाएगा। इन नए जल निकायों में करीब 123 करोड़ लीटर पानी रखने की क्षमता विकसित होने की बात कही गई है।
इस व्यवस्था का फायदा सिर्फ झील को पानी देने तक सीमित नहीं रहेगा। नए वेटलैंड प्रवासी पक्षियों के लिए आवास तैयार करने के साथ आसपास के क्षेत्र में पर्यटन को भी बढ़ावा दे सकते हैं।
खेती के साथ स्थानीय लोगों की आजीविका पर भी असर
लद्दाख में पानी की कमी का सीधा असर खेती और पशुपालन पर पड़ता है। खासकर Tso Kar के आसपास रहने वाले कई ग्रामीण पशुपालन और पाश्मीना बकरी पालन पर निर्भर हैं। झील के सिकुड़ने से आसपास के चरागाह भी प्रभावित हुए हैं, जिसके कारण कई पशुपालकों को अपने घरों से दूर नए चरागाह तलाशने पड़ रहे हैं।
प्रशासन का अनुमान है कि झील में पानी लौटने और आसपास घास के मैदान विकसित होने से स्थानीय चरागाहों को फिर से मजबूत किया जा सकता है। इससे ग्रामीणों को अपनी आजीविका के लिए दूर जाने की जरूरत कम हो सकती है।
लद्दाख प्रशासन की इन पहलों का व्यापक उद्देश्य ग्लेशियर और बर्फ से मिलने वाले पानी को बहकर नष्ट होने से रोकना, कृषि भूमि को सिंचाई उपलब्ध कराना और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना है। एक तरफ स्टोक ग्लेशियर के पानी से बंजर जमीन में खेती को बढ़ावा देने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी तरफ रुपशो खारनाक के पानी से सिकुड़ती Tso Kar झील को पुनर्जीवित करने की योजना पर काम चल रहा है।

